पड़ोस की नई किराएदार दुल्हन की सात दिन तक पलंगतोड चुदाई

ये हॉट देसी स्टोरी मेरी ज़िंदगी की एक ऐसी सच्ची घटना है जिसे मैं हमेशा छुपाना चाहता था, लेकिन अब लगता है कि इसे शब्दों में बयां करने का वक्त आ गया है। मेरा नाम रोहन है और मैं लखनऊ के एक शांत मोहल्ले में रहता हूँ। मेरी उम्र उस वक्त 28 साल थी और मैं एक आईटी कंपनी में काम करता था, ज़्यादातर वक्त घर से ही काम करता। मेरी ज़िंदगी बिल्कुल साधारण थी, उबाऊ कह लो, जब तक कि मेरी नई पड़ोसन उस मकान में नहीं आई जो पिछले छह महीनों से खाली पड़ा था। उस दिन मैं अपनी बालकनी में बैठकर चाय पी रहा था कि अचानक एक ट्रक आकर सामने वाले मकान के सामने रुका। पूरा मकान मेरी बालकनी से साफ दिखता था, और मैं वहाँ अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठकर अक्सर सड़क का नज़ारा देखा करता।

ट्रक से सामान उतरने लगा तो मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी जो सामान को निर्देशित कर रही थी। उसने गहरे हरे रंग का सूट पहना हुआ था, और हवा में उसकी चुनरी हल्के से उड़ रही थी। उसके हाथों की मेंहदी अभी भी गहरी थी, और मांग में सिंदूर भरा था, जिससे साफ पता चलता था कि वो नई-नवेली दुल्हन है। मेरी सांसें थम सी गईं जब मैंने पहली बार उसका चेहरा ठीक से देखा। गोरा रंग, बड़ी-बड़ी हिरणी जैसी आंखें, एकदम नुकीली नाक, और वो होंठ, गुलाबी और भरे हुए, जैसे गुलाब की पंखुड़ियाँ। मैं चाय की चुस्की लेना भूल गया और बस उसे देखता रहा। वो कभी मजदूरों को डांटती, कभी अपने पल्लू को संभालती, और कभी अपने फोन पर किसी से बात करती। उसकी हर अदा देखने लायक थी।

उसका नाम रूपा था, जैसा कि मुझे बाद में मेरी दूसरी पड़ोसन श्रीमती वर्मा ने बताया। रूपा की उम्र करीब 22 साल रही होगी, बिल्कुल जवान, खिलता हुआ बदन। उसका पति, अरुण, एक बैंक मैनेजर था और अक्सर ऑफिस के काम से बाहर रहता था। शादी के बाद ये उनका पहला घर था, और उनका परिवार दूर कानपुर में रहता था। तो रूपा दिन के ज़्यादातर वक्त अकेली रहती। शुरुआती दिनों में मैं बस उसे अपनी बालकनी से देखा करता। वो अक्सर छत पर कपड़े सुखाने आती, या बाहर सब्ज़ी वाले से मोल-भाव करती। कभी-कभी वो अपने घर के छोटे से बगीचे में पौधों को पानी देती, तो उसकी पतली कमर और गोलाई लिए हुए कूल्हे मेरी नज़रों से नहीं बचते। मैं जानता था कि ये गलत है, लेकिन मैं अपनी नज़रें उससे हटा नहीं पाता था।

एक दिन, मेरी किस्मत ने करवट ली। शाम का वक्त था, करीब छह बजे। मैं अपने दरवाज़े के बाहर खड़ा था कि तभी अचानक बारिश शुरू हो गई, इतनी तेज़ कि लोग इधर-उधर भागने लगे। और तभी मैंने देखा कि रूपा अपने घर की ओर भागी जा रही है, उसके हाथ में सब्ज़ी के कुछ थैले थे जो भीग रहे थे। वो फिसलने ही वाली थी कि मैंने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया। छूते ही जैसे मेरे अंदर करंट दौड़ गया। उसकी कलाई इतनी नर्म और मुलायम थी। उसने ऊपर मेरी तरफ देखा, उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, शर्म और शुक्रिया दोनों मिले हुए। |थैंक यू,| वो धीरे से बोली, उसकी आवाज़ बारिश की बूंदों से भी ज़्यादा मीठी थी। |आपका घर यहीं है ना? जल्दी अंदर आइए, आप भीग जाएंगी,| मैंने कहा, अपनी धड़कनों को काबू करने की कोशिश करते हुए।

वो मेरे घर के बरामदे में आ खड़ी हुई। उसका सूट पूरी तरह से भीग चुका था और उसके शरीर की हर रेखा साफ झलक रही थी। मैंने नज़रें झुकाने की कोशिश की पर वो मेरे काबू में नहीं थीं। उसके गीले कपड़े उसके उभारों को और भी निखार रहे थे। उसकी साड़ी के पल्लू से पानी टपक रहा था। |आप यहीं रुकिए, मैं तौलिया लाता हूँ,| कहकर मैं अंदर भागा। तौलिया लाकर जब मैंने उसे दिया, तो हमारी उंगलियां फिर से छू गईं और एक बार फिर वही सिहरन महसूस हुई। उसने तौलिया लेकर अपने बाल पोंछने शुरू किए, और मैं वहीं खड़ा उसे देखता रहा। पानी की बूंदें उसके माथे से ढुलककर उसके गालों पर आ रही थीं और फिर धीरे-धीरे उसकी गर्दन से होते हुए नीचे जा रही थीं। उसकी गर्दन बेहद खूबसूरत थी, लंबी और सुडौल।

कुछ देर बाद बारिश थोड़ी कम हुई तो रूपा ने जाने की इजाज़त मांगी। जाते-जाते वो मुड़ी और बोली, |आपका बहुत-बहुत शुक्रिया, वरना मैं गिर ही जाती।| |कोई बात नहीं, पड़ोसी धर्म निभाना तो बनता है,| मैंने हँसते हुए कहा। उसकी भी हल्की सी मुस्कान देखकर मेरा दिन बन गया। उस घटना के बाद, हमारी नज़रें मिलने लगीं और छोटी-मोटी बातचीत शुरू हो गई। सुबह का नमस्ते, शाम की हल्की-फुल्की गपशप। मैं जान गया कि उसके पति अरुण सप्ताह में तीन-चार दिन ही घर पर होते हैं। अरुण बहुत अच्छा आदमी था, लेकिन काम में बहुत व्यस्त, और रूपा अक्सर अकेली बोर होती रहती थी। मैं उसकी बोरियत दूर करने का एक बहाना ढूंढ रहा था, और जल्द ही मुझे वो बहाना मिल गया।

एक दिन वो अपने वाई-फाई के खराब होने की शिकायत कर रही थी। मैंने तुरंत मदद की पेशकश की। |आइए, मैं देख लेता हूँ, मुझे तकनीकी चीज़ों का थोड़ा शौक है,| मैंने कहा। वो मान गई और मुझे पहली बार उसके घर के अंदर जाने का मौका मिला। उसका घर बेहद साफ-सुथरा और सुगंधित था। हर कोने से उसके हाथों की सजावट और सुंदरता झलक रही थी। मैंने जाकर राउटर को ठीक किया, जो बस प्लग नहीं हुआ था। |लीजिए, हो गया| मैंने मुस्कुराते हुए कहा। |ओह, इतना ही था? मैं तो बेवकूफ हूँ,| वो शर्माते हुए बोली। |नहीं, ऐसा कभी-कभी सबके साथ होता है,| मैंने उसे सहज किया। उस दिन से, मेरा उसके घर आना-जाना थोड़ा बढ़ गया। कभी बल्ब बदलने के बहाने, तो कभी किसी और छोटी-मोटी मदद के।

हर मुलाकात के साथ हमारी नज़दीकियाँ बढ़ रही थीं। वो मुझसे खुलकर बातें करने लगी थी, अपनी पसंद-नापसंद, अकेलेपन की भावना सब साझा करने लगी। मुझे पता चला कि उसकी शादी घरवालों की मर्ज़ी से हुई थी और अरुण से पहली मुलाकात के बाद सीधे शादी। कोई प्रेमी-प्रेमिका वाला रोमांस नहीं था। उसके सपनों का राजकुमार कोई और ही था, लेकिन किस्मत उसे अरुण के पास ले आई। अरुण भी अपने आप में अच्छे इंसान थे, पर रूपा के मन की गहराइयों में जो अधूरी चाहतें थीं, उन्हें वो शायद नहीं समझ पाते थे। मैं हर दिन कुछ न कुछ बहाना ढूंढकर उससे बात करने पहुंच जाता। और अब तो वो भी मेरा इंतज़ार करती हुई सी लगती। अगर मैं किसी दिन नहीं जाता तो अगले दिन वो खुद पूछ बैठती, |कल दिखे नहीं, सब ठीक है?| ये सुनकर मेरे दिल को जो सुकून मिलता, उसे बयां नहीं कर सकता।

हमारे बीच ये जो तनाव बन रहा था, वो अब सिर्फ दोस्ती नहीं रही थी। एक-दूसरे को देखने का अंदाज़ बदल गया था। वो अब मुझसे बात करते वक्त अपनी चुन्नी बार-बार संभालती, अपने होंठों पर ज़बान फिराती। मैं भी उसे देखकर कभी-कभी अपने ख्यालों में खो जाता, जिसे वो भांप लेती और शरमा जाती। माहौल में एक मीठी सी केमिस्ट्री घुलने लगी थी। अब मैं बस मौके का इंतज़ार कर रहा था। और मुझे पता था कि बहुत जल्द वो घड़ी आने वाली है जब ये सब अपनी हदें पार कर जाएगा। रूपा के मन में भी कुछ ऐसी ही जिज्ञासा और आकर्षण जाग रहा था, मैं उसकी आंखों में वो चमक साफ पढ़ सकता था। और फिर वो सात दिन आए जिन्होंने मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल दी।

पहला दिन था, और मौसम सुहाना था। हल्की बूंदाबांदी हो रही थी और मैंने मन ही मन कुछ ठान लिया था। मुझे पता था कि अरुण आज सुबह ही तीन दिन के लिए ऑफिस के किसी टूर पर शिमला गया हुआ है। तो रूपा बिल्कुल अकेली होगी। शाम को मैंने उसके दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाज़ा खोला तो वो एक हल्के गुलाबी रंग की साड़ी में थी, बाल खुले हुए थे, हल्की सी लिपस्टिक लगाई थी, जैसे वो तैयार होकर बैठी थी किसी के आने का इंतज़ार कर रही हो। |अरे, रोहन जी, आप? आइए ना,| उसने मुस्कुराकर कहा। |सोचा, मौसम अच्छा है तो आपसे बात कर लूँ। वैसे भी, आप अकेली होंगी तो बोर हो रही होंगी,| मैंने अंदर कदम रखते हुए कहा। उसके घर में लाइट धीमी थी और एक मीठी सी अगरबत्ती की खुशबू आ रही थी। माहौल परफेक्ट था।

हम सोफे पर बैठ गए, थोड़ी देर इधर-उधर की बातें होती रहीं। मेरी नज़रें बार-बार उसके पल्लू के नीचे से झांकते हुए उसके उभारों पर जा रही थीं। वो भी मेरी बातों में खोई हुई थी, लेकिन उसकी सांसें भी तेज़ हो रही थीं। मैंने हिम्मत जुटाई और धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। उसने झटके से अपना हाथ नहीं खींचा, बस नज़रें झुका लीं। मेरे शरीर में एक गर्म लहर दौड़ गई। |रूपा,| मैं धीमी आवाज़ में बोला, |जब से तुम आई हो, मेरी नज़रें तुम्हें ही ढूंढती हैं।| उसने शरमाकर अपने होंठ दबाए। |आप ऐसी बातें क्यों करते हैं,| वो हल्के से फुसफुसाई।

मैंने उसकी ठुड्डी को पकड़कर धीरे से ऊपर उठाया ताकि उसकी आंखें मुझसे मिलें। उसकी आंखें नम थीं, पर उनमें इनकार नहीं, एक गहरी हां थी। पहली बार हमारे बीच की दूरी खत्म होने वाली थी। मैं धीरे-धीरे उसकी तरफ झुका और उसके होंठों को अपने होंठों से छू लिया। छूते ही जैसे उसके शरीर में बिजली कौंध गई। पहले तो वो जड़ हो गई, फिर धीरे-धीरे उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर हिलाने शुरू कर दिए। पहला चुम्बन कोमल और खोजपूर्ण था, पर उसमें एक गहरी भूख छिपी थी। मेरे होंठों ने उसके नरम और मुलायम होंठों का रस चखा। उसके होंठों का स्वाद मीठा और थोड़ा नमकीन था, जैसे उसने कोई फल खाया हो।

धीरे-धीरे हमारा चुंबन गहराता गया। मेरी ज़बान ने उसके होंठों को भेदा और उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उल्टा, उसने मेरी ज़बान का स्वागत अपनी ज़बान से किया। हम दोनों की ज़बानें आपस में लड़ने और लिपटने लगीं। मेरे हाथ अब बेकाबू होकर उसकी कमर की तरफ बढ़ गए। उसकी साड़ी के ऊपर से ही मुझे उसके शरीर की गर्माहट महसूस हो रही थी। मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया और अपनी तरफ खींच लिया। उसकी सांसें तेज़ हो गई थीं और उसके मुँह से हल्की-हल्की आवाज़ें निकलने लगी थीं। |रोहन, ये गलत है,| उसने चुंबन के बीच बिना विश्वास के कहा। |गलत तब होता जब हम दोनों ये नहीं चाहते,| मैंने उसके कान में फुसफुसाकर कहा और उसके कान की लौ को अपने होंठों से दबा लिया। एक कंपकंपी उसके पूरे शरीर में दौड़ गई और उसने मेरे बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं।

मेरा एक हाथ उसकी पीठ पर था और दूसरा उसकी साड़ी के पल्लू के नीचे से उसके सीने की तरफ बढ़ रहा था। आखिरकार मेरी उंगलियों ने उसके स्तन को छू लिया, जो ब्रा के भीतर भी अद्भुत रूप से नरम और भरा हुआ लग रहा था। मैंने धीरे से उसे दबाया तो उसके मुँह से एक लंबी सिसकी निकली, |आआह्ह्ह्ह…| ये आवाज़ मेरे लिए किसी संगीत से कम नहीं थी। मैंने ज़ोर से उसे अपनी बाहों में भींच लिया और गर्दन पर एक के बाद एक कई चुम्बन दिए। उसकी साड़ी अब अपनी जगह से हिल चुकी थी। मेरे अंदर का जानवर अब जाग चुका था और मैं उसे और करीब से महसूस करना चाहता था।

मैंने धीरे से उसका पल्लू हटाया और उसकी ब्लाउज़ के हुक खोलने लगा। वो बस अपनी आँखें बंद किए हुए थी, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, और उसके हाथ मेरे कंधों पर जमे हुए थे। ब्लाउज़ खुलने के बाद मैंने उसे पूरी तरह उतार दिया और फिर पीछे से ब्रा के हुक खोले। ब्रा जैसे ही नीचे गिरी, मेरी आंखें फट गईं। उसके स्तन बिल्कुल सफेद, मुलायम और तरबूज़ों की तरह गोल थे। उसकी चूचियां गहरे गुलाबी रंग की थीं और अभी तक खड़ी हो चुकी थीं, जिससे मुझे उसकी उत्तेजना का पता चल गया। मैंने दोनों हाथों से उसके दोनों स्तनों को पकड़ लिया और मसलने लगा। उसका मांस मेरी उंगलियों के बीच से छलक रहा था। |रोहन… आह…| वो बस यही कह पा रही थी।

मैंने अपना मुँह खोला और उसकी एक चूची को अपने होंठों में ले लिया। मेरी ज़बान उसकी सख्त चूची के चारों तरफ गोल-गोल घूम रही थी और मैं उसे ज़ोर से चूसने लगा। |आआअह्ह्ह्हह…| रूपा ज़ोर से चीख पड़ी, उसके हाथ मेरे बालों को कस कर पकड़ चुके थे। मैं बारी-बारी से उसके दोनों स्तनों को चूमता, चाटता और चूसता रहा। मैंने अपने दांतों से हल्के से उसकी चूची को काटा तो उसने मेरी पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। अब मेरा हाथ नीचे की तरफ बढ़ रहा था। मैंने उसकी पेटीकोट को ढीला किया और उसके नीचे अपना हाथ डाल दिया। उसकी जांघें मेरे स्पर्श से काँप उठीं। मेरा हाथ धीरे-धीरे उसकी जांघों के बीच के त्रिकोण की तरफ बढ़ रहा था।

जब मेरी उंगलियाँ उसकी पैंटी के ऊपर तक पहुँचीं तो मैंने महसूस किया कि वो पूरी तरह भीग चुकी थी। उसकी रसीली चुत से इतना पानी निकल रहा था कि उसकी पैंटी लथपथ हो गई थी। |तुम्हारी चुत तो सैलाब ला रही है रूपा,| मैंने उसके कान में फुसफुसाकर कहा। ये शब्द सुनते ही वो शर्म से लाल हो गई और उसने अपना मुँह मेरे कंधे में छुपा लिया। ये पहली बार था जब मैंने उसके साथ ‘चुत’ शब्द इस्तेमाल किया था और ये सुनते ही उसके शरीर में एक और तेज़ झटका लगा। मेरी उंगली अब उसकी पैंटी के किनारे से अंदर जा चुकी थी और मैंने उसकी नम चूत की दरार को महसूस किया। मैंने उसकी चूत को धीरे-धीरे सहलाना शुरू कर दिया। मेरी उंगली उसके भगौंठे पर फिसल रही थी, जो चिकना और उभरा हुआ था।

मैंने अपनी उंगली उसकी चुत के छेद पर रखी और हल्के से दबाया। वो अंदर सरक गई। रूपा के मुँह से एक तेज़ सिसकारी निकली, |आआह्ह्ह्ह… रोहन…| उसकी चुत की दीवारें गर्म और तंग थीं, और मेरी उंगली को कस कर पकड़ रही थीं। मैंने अपनी उंगली को धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। चिक-चिक की गीली आवाज़ें कमरे में गूंजने लगीं। मैंने एक और उंगली डाल दी और उसकी चुत को फैलाने लगा ताकि वो मेरे लिए तैयार हो सके। मेरे अंगूठे ने उसकी चूत की चुच्ची (क्लिटोरिस) को रगड़ना शुरू कर दिया जिससे वो पागलों की तरह छटपटाने लगी। |हाँ… वहीं… उह्ह्ह्ह… आह…| वो कराह रही थी।

अब मेरा लंड भी अपनी पूरी सख्ती पर था और मेरी पैंट में बगावत कर रहा था। मैंने खड़े होकर अपनी पैंट और अंडरवियर उतार दिए। मेरा लण्ड तनकर बाहर आ गया, सिर पर से पानी की एक बूंद लटक रही थी। रूपा ने जब मेरा लंड देखा तो उसकी आंखें फैल गईं, क्योंकि वो काफी मोटा और लंबा था। उसने अपने होंठ दबा लिए। मैंने उसका हाथ पकड़ा और अपने लंड पर रखवा दिया। पहले तो उसने हिचकिचाया, फिर उसने अपनी कोमल उंगलियों से मेरे लण्ड को सहलाना शुरू कर दिया। उसका स्पर्श अद्भुत था। मैंने उसे सोफे पर लिटा दिया और उसकी पेटीकोट और भीगी हुई पैंटी उतार दी। अब वो मेरे सामने पूरी तरह नग्न थी, एक अप्सरा की तरह, जिसका बदन दूधिया रोशनी में चमक रहा था।

मैं उसकी टांगों के बीच आ गया। उसकी चुत के बाल हल्के से कटे हुए थे और उसके गुलाबी होंठ शहद से नहाए हुए थे। मैंने अपने लंड को उसकी चुत के मुहाने पर रगड़ना शुरू कर दिया। |रोहन, धीरे से करना,| वो फुसफुसाई। मैंने उसके माथे पर एक चुंबन दिया और धीरे से अपना लंड उसकी तंग चुत में डालना शुरू किया। सिर अंदर जाते ही उसका शरीर एक बार फिर तन गया। मेरे लण्ड की मोटाई से उसकी चुत की दीवारें खिंच रही थीं, और वो गर्म और गीला रास्ता मेरे लिए बनता जा रहा था। |आआअह्ह्ह्हह…| रूपा ज़ोर से चिल्लाई जब मेरा पूरा लंड उसके अंदर तक धंस गया। हम दोनों के जघन की हड्डियाँ आपस में टकरा गईं। मैं एक पल के लिए रुका ताकि वो मेरे लंड की मोटाई और लंबाई को अंदर महसूस कर सके।

फिर मैंने धीरे-धीरे अपना लंड बाहर निकाला और फिर अंदर डाला। हर धक्के के साथ उसकी सांसें तेज़ हो रही थीं। |तेज़ करो, रोहन, मुझे और चोदो,| वो अब पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी और उसने अपनी टाँगें मेरी कमर के चारों ओर लपेट दी थीं। ये सुनकर कि उसने खुद ‘चोदो’ शब्द बोला, मेरा खून गर्म हो गया। मैंने उसकी चुत में अपनी लय तेज़ कर दी। अब हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ें, मेरे लंड के उसकी गीली चुत में घुसने की चिक-चिक की आवाज़ें, और उसकी तेज़ कराहें पूरे कमरे में गूंज रही थीं। |आआह्ह्ह्ह… उह्ह्ह्ह… हाँ… चोदो मुझे… चोदते रहो…| रूपा पागलों की तरह चिल्ला रही थी। उसके नाखून मेरी पीठ को नोच रहे थे। मेरे लण्ड पर उसका रस चढ़ गया था और अब ये चुदाई एक जंगल की आग की तरह फैल रही थी।

पहले दिन की ये चुदाई अपनी चरम सीमा पर पहुंचने वाली थी। मैं ज़ोर से उसकी चुत में अपना लण्ड पटक रहा था, और हर बार मेरा लंड उसकी चूत की गहराई में जाकर टकराता। उसका शरीर मेरे धक्कों से ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके स्तन हिल रहे थे और वो मेरे बालों को खींच रही थी। |रोहन… मैं… मैं आ रही हूँ…| वो चिल्लाई और फिर मैंने महसूस किया कि उसकी चुत की दीवारें ज़ोर से फड़फड़ा रही हैं और मेरे लण्ड को और भी कस कर जकड़ रही हैं। उसका पानी मेरे लंड पर गर्म धार की तरह बह निकला। |आआअह्ह्ह्हह…| वो ज़ोर से चीखी और उसकी टाँगों में ऐंठन आ गई। मुझे भी अब रोकना मुश्किल था। मैंने उसकी चुत के अंदर एक आखिरी ज़ोरदार धक्का लगाया और अपना गाढ़ा वीर्य उसके अंदर की गहराई में छोड़ दिया। मेरा लण्ड ज़ोर-ज़ोर से फड़क रहा था और धड़ाके से मेरा पानी निकल रहा था। मैं उसके ऊपर ही ढह गया और हम दोनों की साँसें फूल गईं। बहुत देर तक हम बिना हिले-डुले एक-दूसरे से लिपटे रहे।

दूसरे दिन मैंने अपनी आँखें खोलीं तो सबसे पहला ख्याल रूपा का ही आया। कल रात हमने एक दूसरे को अलविदा कहा था इस वादे के साथ कि फिर मिलेंगे। मेरे शरीर में कल रात की थकान तो थी, लेकिन उससे ज़्यादा एक बेचैनी थी उसे दोबारा देखने की। दिन निकलते ही मैंने उसे मैसेज किया, |सुबह भूली क्या?| उसका जवाब तुरंत आया, |नहीं, बस सोच रही थी कि ये सब कैसे हो गया।| |बहुत अच्छा हुआ,| मैंने टाइप किया। दिन भर में कई बार मैसेज आए-गए, और शाम को मैं फिर से वहीं था, उसके दरवाज़े पर।

आज उसने खाना बनाया था। |पहले खाना खाइए,| उसने शरारत भरी नज़रों से कहा। मुझे एहसास हुआ कि ये सिर्फ देह का रिश्ता नहीं बन रहा था, इसमें अपनापन भी शामिल हो रहा था। खाने की टेबल पर हमारी जाँघें छू रही थीं और हर छोटे स्पर्श पर एक करंट सा दौड़ता। खाना खत्म करने के बाद जब वो बर्तन साफ कर रही थी, तो मैं पीछे से आया और उसकी कमर में हाथ डालकर अपनी तरफ खींच लिया। उसके बदन से रसोई और इत्र की मिली-जुली खुशबू आ रही थी। मैंने उसकी गर्दन पर चुंबन दिया और वो सिहर उठी। |बर्तन छोड़ो,| मैंने धीरे से कहा।

हम दूसरे कमरे में गए जो उनका बेडरूम था। ये कमरा पिछले वाले कमरे से ज़्यादा निजी था और यहाँ उसके पति की फोटो भी लगी थी। लेकिन आज हमें किसी चीज़ की परवाह नहीं थी। मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और खुद उसके ऊपर झुक गया। आज का खेल ज़्यादा धीमा और गहरा होने वाला था। मैंने उसके पूरे शरीर को चूमना शुरू किया। माथे से शुरू करके, पलकों पर, नाक की नोक पर, और फिर उसके रसीले होंठों पर। धीरे-धीरे मैंने अपनी ज़बान उसके होंठों पर फेरी और उसने अपने मुँह को खोल दिया। हम दोनों ने एक दूसरे की ज़बानों को चूसा, और मेरा हाथ उसकी कमीज़ के नीचे चला गया।

आज वो सलवार सूट में थी, जिसे मैंने बड़ी आसानी से उतार दिया। उसके शरीर पर सिर्फ ब्रा और पैंटी थी। ब्रा आज काले रंग की थी, जो उसके गोरे बदन पर बहुत भड़कीली लग रही थी। मैंने उसे ब्रा उतारे बिना ही उसके स्तनों को ब्रा के ऊपर से दबाया और चूमा। फिर मैंने ब्रा के कप को नीचे खिसकाया और उसकी चूचियों को बाहर निकाल लिया। वो फिर से उतनी ही सख्त थीं। मेरी ज़बान ने उन्हें गीला किया, मेरे दांतों ने उन्हें खींचा, और मेरे होंठों ने उन्हें ज़ोर से चूसा। उसके मुँह से निकल रही आवाज़ें संगीत की तरह थीं। |हाँ… वहीं चूसो… आआह्ह्ह्ह…| वो अपनी उंगलियाँ मेरे कान के पीछे फेर रही थी।

फिर मैंने उसकी टाँगें फैलाईं और अपना मुँह सीधे उसकी चुत पर लगा दिया। उसने चौंककर मेरे बाल पकड़ लिए। |रोहन… ये क्या कर रहे हो?| वो चीखी। लेकिन मैं जवाब देने की बजाय अपनी ज़बान उसकी चुत के भीतर घुसाने लगा। उसकी चूत का स्वाद तीखा और नमकीन था, और वो रस लगातार बह रहा था। मेरी नाक उसकी भगौंठे से रगड़ खा रही थी और मेरी ज़बान उसकी चुत के छेद के अंदर जा रही थी। मैं उसकी चूत को खा रहा था, पूरे जुनून से। |आआअह्ह्ह्हह… रोहन… मर जाऊंगी…| वो चीखती रही। मेरी ज़बान ने उसकी चूत के भगौंठे पर तेज़ी से कंपन करना शुरू कर दिया और उसका शरीर मिर्गी के दौरे की तरह काँपने लगा। उसने मेरे मुँह पर ही अपना पानी छोड़ दिया, और मैंने एक-एक बूंद चाट ली।

अब मेरी बारी थी। मैंने उलटकर उसे अपने ऊपर खींच लिया। मेरा लंड बिल्कुल आसमान की तरफ इशारा कर रहा था। |अब तुम करो, रूपा,| मैंने कहा। पहले तो वो झिझकी, लेकिन फिर उसने अपनी टाँगें मेरे लंड के दोनों तरफ रखीं और धीरे-धीरे बैठना शुरू किया। उसने अपना हाथ पीछे ले जाकर मेरा लण्ड पकड़ा और अपनी चुत के मुहाने पर लगाया। देखते ही देखते मेरा लंड उसकी रसीली चुत में गायब हो गया। ऊपर से ये नज़ारा और भी शानदार था। उसके स्तन मेरे सामने झूल रहे थे और उसके चेहरे के भाव एकदम बदल गए थे। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपने कूल्हों को घुमाने लगी। मेरा लंड उसकी चुत की भीतरी दीवारों से रगड़ खा रहा था। |आआह्ह्ह्ह… कितना गहरा जा रहा है…| वो कराह रही थी।

इस पोज़ में मैं बिल्कुल स्थिर था और वो मुझे चुदवा रही थी, अपने हिसाब से, अपनी लय में। मैं उसके कूल्हों को पकड़कर उसे और नीचे धकेलता। |हाँ… चोदो मुझे… मेरी चुत में अपना पूरा लंड डालो…| वो ज़ोर से बोली। अब उसकी हरकतें तेज़ हो गई थीं। वो ज़ोर-ज़ोर से मेरे लंड पर उछल रही थी। मेरे लंड पर उसकी चुत का मैल जम गया था, जिससे एक सफेद परत दिख रही थी। मेरे गोले भीग कर चिपक गए थे। मैंने उसकी कमर पकड़ी और अपने कूल्हे ऊपर को उठाने शुरू कर दिए ताकि हर धक्का और गहरा लगे। चुदाई का ये दौर बहुत देर तक चला।

फिर मैंने उसे पीछे से लेने का फैसला किया। मैंने उसे अपने ऊपर से उतारा और पलटकर उसकी कमर ऊँची करके बिस्तर पर घुटनों के बल करवट दी। ये डॉगी पोज़ मेरा पसंदीदा था। पीछे से उसकी चुत और भी खुली और बुलबुली हुई थी। मैंने अपना लंड एक हाथ से पकड़ा और एक झटके में पूरा अंदर तक डाल दिया। |उउउह्ह्ह्ह…| वो तकिये में मुँह दबाकर चिल्लाई। मैंने उसके गोल-गोल चूतड़ों को दोनों हाथों से पकड़ा और ज़ोर-ज़ोर से धक्के देने लगा। मेरे गोले उसके चूतड़ों से टकरा रहे थे। पीछे से मेरा लंड सीधा उसकी गहराई में जा रहा था। |चोदते रहो… मैं आ रही हूँ…| वो चिल्ला-चिल्लाकर कह रही थी।

इसके बाद मैंने उसे बिस्तर के किनारे लिटाकर खड़े-खड़े उसकी चुदाई की। मैंने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और उसकी तरफ झुक गया। इस पोज़ में उसकी चुत एकदम टाइट हो गई थी क्योंकि उसकी टाँगें आपस में जुड़ गई थीं। मैंने अपना लंड उसमें डाला और धीरे-धीरे लेकिन गहरे धक्के लगाने लगा। हर बार मेरा लंड उसकी कोख तक जा रहा था। |रोहन… धीरे से…| वो फुसफुसाई लेकिन मैं रुक नहीं सका। मेरे हर धक्के के साथ बिस्तर चरमरा रहा था। और जब मैंने अपना वीर्य उसके अंदर छोड़ा तो ऐसा लगा जैसे शरीर की सारी ऊर्जा खत्म हो गई। हम दोनों पसीने से लथपथ हो चुके थे। दूसरा दिन भी एक अलग अनुभव था, और अब हम एक-दूसरे के शरीर को बेहतर ढंग से जान गए थे।

तीसरे दिन की सुबह अरुण का फोन आया। रूपा ने मुझे चुप रहने का इशारा करते हुए फोन उठाया। वो अपने पति से बात कर रही थी और मैं उसके बिल्कुल पीछे खड़ा उसकी गर्दन चूम रहा था। ये एक अजीब सा रोमांच था। उसे जवाब देने में दिक्कत हो रही थी क्योंकि मेरे हाथ उसके शरीर पर घूम रहे थे। जैसे ही उसने फोन काटा, उसने मुझे चंचल गुस्से से मारा। |पागल हो क्या? पकड़े जाते तो?| उसने हंसते हुए कहा। |तो और मज़ा आता,| मैंने शरारत से कहा और उसे गोद में उठा लिया।

आज मैं कुछ और सोचकर आया था। मैं उसकी चुदाई एक बिल्कुल नई जगह पर करना चाहता था। उनके घर के पीछे एक छोटी सी रसोई थी जहाँ एक बड़ी सी स्लैब पड़ी थी। मैं उसे वहाँ ले गया। |यहाँ?| उसने हैरानी से पूछा। |हाँ,| मैंने कहा और उसका सूट ऊपर कर दिया। उसने स्लैब पर हाथ रख दिए और मैंने पीछे से उसकी सलवार नीचे खिसकाई। उसकी पैंटी गीली होने लगी थी। मैंने अपनी पैंट खोली और अपना तना हुआ लंड बाहर निकाला। बिना किसी भूमिका के, मैंने उसे पीछे से ले लिया। रसोई की टाइलें ठंडी थीं और हमारे शरीर गर्म। ये ठंडी-गर्म सिहरन और भी मज़ा दे रही थी। वो स्लैब पकड़े ज़ोर से साँसें ले रही थी और मैं उसे चोद रहा था।

हर धक्के के साथ उसके चेहरे के भाव बदल रहे थे। उसकी चीखें तेज़ होती जा रही थीं। मैंने उसकी गर्दन पकड़कर उसे अपनी तरफ खींचा और उसके कान में फुसफुसाया, |क्या तुम अपने पति से भी ऐसे चुदवाती हो?| ये सुनते ही वो और गर्म हो गई। |नहीं… वो कभी ऐसे नहीं…| वो हाँफते हुए बोली। ये जवाब सुनकर मेरा लंड और सख्त हो गया। मैं ज़ोर-ज़ोर से उसकी चुत में घुसे जा रहा था। अब वो पूरी तरह से एक चुदक्कड़ बन चुकी थी, और मुझे बस चोदते जाने का मन कर रहा था। मैंने उसे रसोई की हर जगह पर चोदा। स्लैब पर, फ्रिज के सहारे, और अंत में फर्श पर लिटाकर। उस दिन मैंने उसकी चुत में तीन बार पानी छोड़ा।

चौथे दिन मौसम ने करवट ली और तेज़ बारिश होने लगी। पूरा आसमान काला था और बिजली चमक रही थी। इस मौसम में चुदाई का अपना ही मज़ा था। रूपा ने खिड़की खोल दी थी और ठंडी हवा के झोंके कमरे में आ रहे थे। आज हमने पहले बहुत देर तक बातें कीं। हम साथ में बैठकर चाय पी रहे थे। और चाय पीते-पीते ही हमारी नज़दीकियाँ बढ़ गईं। मैंने उसे अपनी गोद में बैठा लिया और अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। बारिश की बूंदों की आवाज़ के साथ-साथ हमारे चुंबन की आवाज़ें आ रही थीं।

चौथे दिन का सेक्स कोमल और भावनात्मक था। हमने एक दूसरे के पूरे शरीर को तेल से मालिश किया। मैंने उसके लिए नारियल का तेल मंगवाया था। मैंने उसे पेट के बल लिटाकर, उसकी पीठ पर, जाँघों पर और फिर उसके सुडौल चूतड़ों पर तेल लगाया। तेल की चिकनाहट से उसकी त्वचा और भी चमक रही थी। मेरे हाथ उसकी चूत की दरार में फिसल रहे थे। फिर उसने मेरे लंड पर तेल लगाया और उसे धीरे-धीरे हिलाने लगी। जब हमने चुदाई शुरू की, तो तेल की वजह से मेरा लंड एकदम आसानी से उसकी चुत में फिसल रहा था। हर धक्का मुलायम लेकिन गहरा था। हम दोनों ने आज एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए चोदा और ये अनुभव बाकी दिनों से बिल्कुल अलग और गहरा था।

पाँचवे दिन मैंने सोचा कि क्यों न आज थोड़ा बाहर घूमकर आया जाए। हम शहर के बाहरी इलाके में एक सुनसान झील के किनारे गए। वहाँ दूर-दूर तक कोई नहीं था। कार में ही हमने शुरुआत कर दी। सीट को पीछे करके उसने मेरा लंड चूसना शुरू कर दिया। उसका मुँह गर्म और गीला था। वो मेरे लण्ड के सिर को अपनी ज़बान से चाटती, फिर गहराई तक ले जाती। मैंने जब उसके मुँह में अपना पानी छोड़ा, तो उसने बिना किसी झिझक के पूरा निगल लिया। इस दृश्य ने मुझे पागल कर दिया।

कार के बाद हम बाहर निकले और एक पेड़ के सहारे मैंने उसे चोदा। प्रकृति के बीच में, खुली हवा में चुदाई का रोमांच अलग ही स्तर का था। उसकी चीखें जंगल में गूंज रही थीं। मैंने उसकी सलवार उतारी और उसने अपनी टाँगें मेरी कमर के चारों ओर लपेट दीं। मैं उसे उठाकर चोदने लगा। ये एक मुश्किल पोज़ था लेकिन इसमें लंड बहुत गहराई तक जा रहा था। उस दिन हमने जमीन पर घास बिछाकर भी खूब चोदा। पाँचवे दिन का रोमांच बहुत ही खास था।

छठे दिन की सुबह हमने एक साथ नहाई। बाथरूम में शॉवर के नीचे मैंने उसके शरीर पर साबुन लगाया और उसके एक-एक हिस्से को साफ किया। पानी की बौछारों के बीच मैंने उसकी चूत में साबुन लगाकर अपनी उंगलियाँ डालीं और उसे उत्तेजित किया। साबुन के झाग से हमारे शरीर फिसल रहे थे। मैंने उसे दीवार पर टिकाया और एक टाँग ऊपर उठाकर खड़े-खड़े चोदा। नहाने का पानी और हमारा पसीना एक हो गया।

शाम तक हम बिस्तर पर ही रहे। अब तक रूपा पूरी तरह से एक चुदक्कड़ बन चुकी थी। उसकी झिझक खत्म हो चुकी थी, और अब वो खुद नई-नई पोज़िशन बता रही थी। उसने उलटा लेटकर अपनी टाँगें सिर के पीछे कर लीं और अपनी चुत मेरे सामने पेश कर दी। |लीजिए, ये लीजिए अपनी चुत,| उसने मुस्कुराकर कहा। इस पोज़ में उसकी चूत एकदम बाहर को निकली हुई थी और मेरे लंड को अंदर लेने के लिए पूरी तरह तैयार थी। मैंने कोई रहम नहीं दिखाया और जी भर के उसे चोदा। हर धक्के के साथ मैं उसकी चूत के और करीब होता जा रहा था।

सातवाँ और आखिरी दिन आ पहुँचा। ये दिन थोड़ा उदास था, क्योंकि कल अरुण को वापस आना था। हम दोनों जानते थे कि ये हमारी आखिरी मुलाकात हो सकती है, या शायद इस तरह की लगातार मुलाकातें अब खत्म होने वाली हैं। इसलिए हमने इस दिन को बहुत खास बनाने का फैसला किया। मैंने उसके लिए एक लाल रंग की साड़ी ला कर दी थी, बिल्कुल दुल्हन वाली। उसने वो पहनी और मेरे लिए एक नाच किया। धीमे-धीमे गाने पर वो अपना घूँघट हटा रही थी और मुझे इशारे से बुला रही थी। वो बेहद खूबसूरत लग रही थी।

हमने सातवें दिन की शुरुआत एक लंबे फोरप्ले से की। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाकर उसकी साड़ी का पल्लू हटाया और उसकी ब्लाउज़ के हुक खोले। इस बार मैंने कोई जल्दी नहीं की। मैंने उसके पूरे शरीर को अपनी ज़बान से सहलाया। नाभि पर चाटा, कमर की हड्डियों पर चूमा, और जाँघों के भीतरी हिस्सों को धीरे-धीरे चूसा। वो पागल हो रही थी। |रोहन, अब और मत सताओ, मुझे अपना लौड़ा दो,| वो गिड़गिड़ाई। ये शब्द सुनकर मैं भी अब और नहीं रुक सका।

मैंने उसकी टाँगों को फैलाकर अपना मोटा लण्ड उसकी प्यासी चुत में डाल दिया। अंदर जाते ही लगा जैसे कोई कीमती म्यान हो। मैंने उसे मिशनरी पोज़ में लेटाकर ज़ोरदार चुदाई शुरू कर दी। |बोलो, तुम कौन हो?| मैंने उसकी चुत में अपना लंड पटकते हुए पूछा। |मैं… मैं तुम्हारी रंडी हूँ… तुम्हारी चुदक्कड़ दुल्हन…| वो चीखी। |और क्या चाहिए तुम्हें?| मैंने दोबारा पूछा। |चुदाई… बस चुदाई… अपने लंड से मेरी चुत को चोदो रोहन…| वो ज़ोर से कराही। ये संवाद मेरे लिए अमृत जैसे थे। मैंने उसे उल्टा लिटाकर, फिर कुत्ते की तरह, और अंत में उसे दीवार से सटाकर चोदा।

आखिरी बार जब मैंने अपना वीर्य उसकी चुत के अंदर छोड़ा, तो ऐसा लगा जैसे मैंने अपनी जान दे दी हो। मेरे लण्ड से पानी की गर्म धार निकली और उसकी चूत में भर गई। उसी वक्त उसका भी चरमोत्कर्ष हुआ और हम दोनों एक साथ ज़ोर से चिल्लाए। हम दोनों बिस्तर पर ढेर हो गए। सुबह जब मैं उठा तो वो चाय बनाकर ले आई थी। हम चुपचाप बैठे रहे। अरुण के आने का समय हो गया था। मैंने उठकर अपने कपड़े पहने और जाने लगा। दरवाज़े पर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान थी। |थैंक यू, रोहन,| वो फुसफुसाई। मैं कुछ नहीं बोल पाया और बस मुस्कुराकर वापस अपने घर आ गया। वो सात दिन आज भी मेरी यादों में एक गहरे राज़ की तरह बसे हुए हैं, और जब भी बारिश आती है, मुझे मेरी वो पड़ोसन नई दुल्हन की याद आ जाती है, जिसे चोदने की ये सात दिन लंबी कथा मेरी ज़िंदगी की सबसे हॉट याद बन गई।

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